89 छात्रावासों वाले जिले में प्रभार आवंटन को लेकर विवाद, कथित मासिक वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग
छतरपुर। जिले के जनजातीय कार्य विभाग में छात्रावासों के संचालन और अधीक्षकों को प्रभार सौंपने की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। चंदला विधानसभा क्षेत्र में एक ही अधीक्षक को तीन-तीन छात्रावासों का प्रभार दिए जाने का मामला सामने आया है। इस व्यवस्था को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्राप्त आरोपों के अनुसार, छतरपुर जिले में कुल 89 छात्रावास संचालित हैं। ऐसे में छात्रावासों की बेहतर निगरानी, विद्यार्थियों की देखभाल और शैक्षणिक व्यवस्थाओं के सुचारु संचालन के लिए प्रभार आवंटन की पारदर्शिता बेहद जरूरी है। लेकिन एक ही अधीक्षक को कई छात्रावासों की जिम्मेदारी सौंपे जाने से व्यवस्थाओं की निगरानी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
मासिक वसूली के आरोप, जांच की दरकार मामले में जिला कार्यालय के अधिकारियों और कुछ अधीक्षकों के बीच कथित सांठगांठ तथा मासिक रकम के लेनदेन के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि छात्रावासों से एकमुश्त रकम एकत्र कर अधिकारियों तक पहुंचाई जाती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
यदि छात्रावासों के बजट या विद्यार्थियों के भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए आवंटित राशि में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो यह गंभीर विषय है। छात्रावासों में रहने वाले आदिवासी विद्यार्थियों के भोजन, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
जिला अधिकारी की भूमिका पर सवाल
जनजातीय कार्य विभाग के जिला अधिकारी मनोज अहिरवार की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर किन नियमों और परिस्थितियों के आधार पर एक अधीक्षक को तीन-तीन छात्रावासों का प्रभार दिया गया? क्या इसके पीछे प्रशासनिक आवश्यकता है या प्रभार आवंटन में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है?
इन सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड, प्रभार आवंटन आदेशों और वित्तीय दस्तावेजों की जांच से ही सामने आ सकता है। संबंधित अधिकारी का पक्ष और आरोपों पर उनका स्पष्टीकरण भी सामने आना आवश्यक है।
उच्चस्तरीय जांच की उठी मांग
मामले में छात्रावासों के प्रभार आवंटन, अधीक्षकों की नियुक्ति, मासिक खर्च, भोजन व्यवस्था और सरकारी राशि के उपयोग की निष्पक्ष जांच कराए जाने की आवश्यकता है। यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: क्या जनजातीय विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए विभागीय व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होगी, या छात्रावासों के प्रभार और कथित लेनदेन से जुड़े सवाल फाइलों में ही दबकर रह जाएंगे?

