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पंचतत्व में विलीन हुए डॉ. एस.डी. मिश्रा सेवा, संवेदना और समर्पण के एक युग का अंत, व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

राघव भास्कर लवकुशनगर। अक्षय तृतीया का दिन क्षेत्र के लिए बेहद दुखद साबित हुआ। सरल, सहज और सेवा भाव से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस.डी. मिश्रा अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके निधन के साथ ही क्षेत्र ने एक ऐसे डॉक्टर को खो दिया, जिन्होंने हजारों मरीजों को जीवनदान दिया और चिकित्सा सेवा को मिशन की तरह जिया।बताया जा रहा है कि सोमवार रात लगभग 9 बजे डॉ. मिश्रा अपने घर पर थे। रोज की तरह उन्होंने अपनी क्लिनिक में मरीजों का उपचार किया था। वे लंबे समय से बीपी और शुगर जैसी बीमारियों से जूझ रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।घटना की रात जब एक मरीज उनके पास पहुंचा, तब भी अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने उसे कमरे में बुलाकर जांच की और उपचार लिखा। इसी दौरान उन्हें अचानक सीने में तेज दर्द हुआ। उन्होंने तुरंत अपने करीबी विपिन गुप्ता (मेडिकल स्टोर संचालक) को बुलाया। विपिन के पहुंचने से पहले ही डॉ. मिश्रा अचेत होकर गिर पड़े।परिजनों और सहयोगियों—बल्लू चौबे, वीरेंद्र त्रिपाठी और साकेत—ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया। लेकिन यहां जो स्थिति सामने आई, उसने सभी को झकझोर कर रख दिया। आरोप है कि अस्पताल की इमरजेंसी में उस समय कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। परिजन और साथ आए लोग आधे घंटे तक डॉक्टर को बुलाने के लिए प्रयास करते रहे, फोन लगाते रहे, लेकिन कोई भी चिकित्सक मौके पर नहीं पहुंचा।इस दौरान वीरेंद्र त्रिपाठी लगातार सीपीआर देते रहे, जबकि अस्पताल स्टाफ इधर-उधर भागता रहा। काफी देर बाद ऑक्सीजन लगाने का प्रयास किया गया, लेकिन तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी थी। लगभग आधे घंटे बाद पहुंचे डॉक्टर ने जांच कर उन्हें मृत घोषित कर दिया।इस घटना ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस अस्पताल में डॉ. मिश्रा ने वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं, वहीं उनके अंतिम समय में एक डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हो सका।डॉ. मिश्रा के निधन की खबर फैलते ही सैकड़ों लोग अस्पताल पहुंच गए। पूरे नगर में शोक की लहर दौड़ गई। हर आंख नम थी और हर कोई इस अपूरणीय क्षति से स्तब्ध था। उन्होंने न केवल अपने परिवार, बल्कि हजारों परिवारों को सहारा दिया था, जो आज खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।डॉ. मिश्रा 80-90 के दशक में उत्तर प्रदेश के ओरन गांव से लवकुश नगर आए थे और यहीं के होकर रह गए। उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुडेरी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लवकुश नगर में लंबे समय तक सेवाएं दीं। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अपने घर पर क्लिनिक चलाकर अंतिम समय तक लोगों की सेवा जारी रखी।उनका निधन सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण के एक युग का अंत है।

व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है और कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
डॉ. मिश्रा के अस्पताल पहुंचने के समय इमरजेंसी में किस डॉक्टर की ड्यूटी थी?
आधे घंटे तक डॉक्टर की अनुपस्थिति क्यों रही?
क्या इस लापरवाही की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?
यह घटना एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की हकीकत उजागर करती है। सवाल यह भी है कि आखिर कब तक आम लोग ऐसी लापरवाही का शिकार होते रहेंगे और कब तक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने से बचते रहेंगे।डॉ. एस.डी. मिश्रा भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनकी सेवा, संवेदना और समर्पण हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेगा।

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