छतरपुर | छतरपुर जिले में केन नदी किनारे चल रहे विस्थापितों के आंदोलन ने राजनीति की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। 12 दिनों तक चले पंचतत्व सत्याग्रह के दौरान जहां हजारों आदिवासी परिवार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते नजर आए, वहीं क्षेत्र के जनप्रतिनिधि पूरी तरह नदारद रहे।बिजावर विधायक राजेश शुक्ला ‘बबलू’ और टीकमगढ़ सांसद व केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार की चुप्पी ने जनता के बीच गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। हालात ऐसे रहे कि आंदोलन के दौरान विस्थापित परिवारों ने सांकेतिक रूप से चिता और फांसी जैसे दृश्य प्रस्तुत कर अपनी पीड़ा जाहिर की, लेकिन सत्ता और विपक्ष दोनों ही खेमों से कोई ठोस पहल सामने नहीं आई।
जनता चिता पर और माननीय मौन! केन विस्थापितों के संघर्ष में जनप्रतिनिधि गायब, प्रशासन ने संभाली कमान
4/17/2026 12:02:00 am
हालांकि विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी मौजूदगी भी नहीं दिखी।
मुसीबत में मुंह मोड़ते जनप्रतिनिधि-
जल, जंगल और जमीन की बात करने वाले नेताओं की गैरमौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आदिवासी केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह गए हैं। क्षेत्रीय जनता अब खुलकर इन नेताओं की निष्क्रियता की आलोचना कर रही है।
प्रशासन बना सहारा-
जहां जनप्रतिनिधि दूरी बनाए रहे, वहीं जिला प्रशासन ने मोर्चा संभाला। कलेक्टर पार्थ जैसवाल के निर्देश पर अपर कलेक्टर नमः शिवाय अरजरिया के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम ने आंदोलनकारियों से सीधे संवाद किया।
एक बार विरोध झेलने के बावजूद प्रशासनिक अमला दोबारा मौके पर पहुंचा और करीब 5 घंटे तक चली मैराथन चर्चा के बाद समस्याओं के समाधान का रोडमैप तैयार किया। प्रशासन की इस पहल ने आंदोलनकारियों में भरोसा जगाया और हालात को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई।
अल्टीमेटम और चेतावनी-
आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर और प्रभावित आदिवासियों ने कलेक्टर की कार्यशैली की सराहना की है। साथ ही उन्होंने जनप्रतिनिधियों को चेतावनी देते हुए 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि वादे पूरे नहीं हुए और नेताओं ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, तो अगला आंदोलन और उग्र होगा, जिसकी गूंज छतरपुर से लेकर भोपाल और दिल्ली तक सुनाई देगी।केन विस्थापन का यह मुद्दा अब केवल स्थानीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर उभरा है। जनता अब जवाब चाहती है—और जल्द चाहती है।

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