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क्या लोकतंत्र क्या फिर शर्मिंदा हुआ?


- मामला खजुराहो लोकसभा का जहाँ निर्वाचन अधिकारी ने सपा प्रत्याशी का नामांकन कर दिया निरस्त

(धीरज चतुर्वेदी छतरपुर बुंदेलखंड)

लोकतंत्र? प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। परिभाषा तो लोक यानि जनता और तंत्र यानि शासन। अगर मूल रूप से उल्लेखित करें तो जनता का, जनता के लिये और जनता के द्वारा। अब लोकतंत्र के विखंडित बेहाली पर आरोप लग रहे है। ताज़ा मामला लोकतंत्र के सबसे बड़े महोत्सव से जुडा है जहाँ एक निर्वाचन अधिकारी पर आरोप है कि वह किसी गेम प्लान में शामिल होकर एक प्रत्याशी का नामांकन निरस्त कर देता है। चूंकि यह मामला उस खजुराहो लोकसभा से जुडा है जहाँ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा फिर से चुनावी समर में उतरे है। 



खजुराहो लोकसभा से इण्डिया गठबंधन की सपा प्रत्याशी मीरा दीपनारायण यादव का पन्ना कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी ने नामांकन ख़ारिज कर दिया। कारण निर्वाचन फॉर्म के भाग-3 में हस्ताक्षर नहीं किये। साथ ही  प्रमाणित मतदाता सूची संलग्न नहीं की गई। अब जो जानकारी सामने आ रही है कि निर्वाचन अधिकारी की डियूटी होती है कि नामांकन भरते समय कुछ गलतियों को सुधार कराये।  आखिर पन्ना जिले के निर्वाचन अधिकारी ने इन गलतियों में सुधार कराने के बजाय क्यों सपा प्रत्याशी का नामांकन पत्र स्वीकार कर लिया? जिसे बाद में ख़ारिज कर दिया? क्या लोकतंत्र का शासन बेईमान हो चुका है? जो अपने दायित्व की जानबूझकर डियूटी नहीं निभाता और खुद गलती कर अपने अधिकारों का उपयोग कर सत्ता के लिये अपने पद का दुरपयोग करता है? खजुराहो सीट पर सपा प्रत्याशी मीरा दीपनारायण का नामांकन ख़ारिज होने के बाद अब यह मामला देशव्यापी होकर गंभीर हो चुका है। यह साधारण मामला नहीं बल्कि लोकतंत्र के चीरहरण से जुड़ चुका है। जैसा की सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मामले को लोकतंत्र की हत्या बताया है। 

सूत्रों से हासिल जानकारी अनुसार मीरा यादव ने जो नामांकन पत्र पेश किया था उसकी फोटोकॉपी में मीरा यादव के हस्ताक्षर है लेकिन जो निर्वाचन विभाग पन्ना से जानकारी हासिल हुई है उस फॉर्म में मीरा यादव के हस्ताक्षर नहीं है। अब गलत कौन है यह तो गंभीर जाँच का विषय है… फिलहाल तो जिस आधार पर पन्ना के निर्वाचन अधिकारी ने सपा प्रत्याशी मीरा यादव का नामांकन निरस्त किया है। इस मामले में जानकारों के अनुसार निर्वाचन अधिकारी की भूमिका अत्यंत चमत्कारी है? अगर ऐसा है तो लोक का तंत्र अब यानि लोकशाही के इशारे की कठपुतली बन चुका है जो सत्ता के इशारे पर लोकतंत्र की हत्या कर रहा है।

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