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कर्मभूमि महेवा में बिखरी धरोहर को इंतज़ार है रहनुमा का

कर्मभूमि महेवा में बिखरी धरोहर को इंतज़ार है रहनुमा का



साल में एक दिन बुन्देल केसरी राजा छत्रसाल को याद कर भुला दिया जाता है। 22 मई को उनके जन्मोत्सव पर आयोजन के नाम पर लाखो रूपये ठिकाने लगा दिया जाता है। सवाल उठता है कि महाराजा छत्रसाल के अतीत को सजोने के उदेश्य को क्या मिला। महोत्सव के शोर में महाराज की आत्मा रो रही जिसे सुनने वाला कोई नहीं है। उनकी कर्मभूमि ग्राम महेवा में राजा छत्रसाल की धरोहर लावारिस की तरह बिखरी पढ़ी है। कई ऐतिहासिक ईमारतो को दफीना गिरोह ने उजाड़ दिया। जो स्मृतिया शेष बची है वह देखरेख के आभाव में जर्जर होकर अस्तित्वहीन होती जा रही है। बुंदेलखंड के लिये 22 मई का दिन अनमोल है। बुंदेलखंड केसरी राजा छत्रसाल का आज जन्म हुआ था। पराक्रम और वीरता की ताकत पर उन्होंने बुंदेलखंड राज्य स्थापित किया। छतरपुर जिले का ग्राम महेवा उनकी कर्मभूमि रहा। उनके द्वारा निर्मित इमारते, मंदिर आज भी राजा छत्रसाल की यादो को जर्जर हालत में संजोये है। जो सभी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। महाराजा के नाम पर महोत्सव पर लाखो रूपये का खर्च और दूसरी तरफ उनकी बंजर-उजाड़ होती विरासत। जो राजा छत्रसाल के साथ धोखे से कम नहीं है। ग्राम महेवा का अद्भुत चित्रण है। चारो तरफ से पहाड़िया, कई एकड़ क्षेत्रफल में फैली झील, प्राकृतिक सौंदर्य के साथ बुंदेलखंड की ऐतिहासिक गाथा को साक्षात् दर्शन कराती धरोहर। इस गांव का पर्यटक स्थल के रूप में विकास किया जाता तो राजा छत्रसाल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती है पर अफ़सोस है कि दिखावे में हकीकत को कुचल दिया गया है। महेवा में 52 महल का परिसर है जहाँ महाराजा छत्रसाल का परिवार निवास करता था। इस परकोटे में पूरे 52 महलो में अलग अलग चौक, कुआँ इत्यादि थे। यही राजा छत्रसाल का दरबारे आम था जिसे बारह दरी कहते थे। जहाँ महाराज आम लोगो से मिला करते थे। राजा छत्रसाल की समाधि , श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर, महाराजा की रानी और पटरानीयों की समाधि सहित छत्रसाल के शासन से जुडी कला, संस्कृति को दर्शाती ऐतिहासिक इमारते है। जो समय के थपेड़ो में खत्म होती जा रही है। राजा छत्रसाल की जयंती पर उत्सव, वहीं महाराज की बिलखती आत्मा। इस तरह के ढोंग पाखंड का दिखावा कर क्या सच्चे मन से राजा छत्रसाल को याद किया जा रहा है,, सवाल उठते है और उठते रहेंगे।

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