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छतरपुर मेले में झूलों के नाम पर बड़ा खेल! ठेका प्रक्रिया से लेकर स्थापना तक भ्रष्टाचार के आरोप

 


झूलों के बीच 10 फीट की दूरी और रास्तों की चौड़ाई के नियमों की अनदेखी का आरोप, पार्षद प्रतिनिधि सुरेंद्र साहू ने मेला प्रबंधन को घेरा

छतरपुर। शहर में आयोजित चर्चित मेला जलविहार अब मनोरंजन से ज्यादा विवादों को लेकर सुर्खियों में है। मेले में लगाए गए झूलों की स्थापना, ठेका प्रक्रिया और व्यवस्थाओं को लेकर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। पार्षद प्रतिनिधि सुरेंद्र साहू ने मेला प्रबंधन और नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि मेले में ठेके के अलावा भी बड़े स्तर पर लेनदेन हुआ है। वहीं, नियमों को ताक पर रखकर झूले स्थापित किए गए हैं, जिससे लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

झूलों की दूरी के नियमों की अनदेखी का आरोप

पार्षद प्रतिनिधि सुरेंद्र साहू के मुताबिक, निर्धारित मानकों के अनुसार झूलों के बीच कम से कम 10 फीट की दूरी होनी चाहिए, लेकिन मेले में कई झूले एक-दूसरे से सटाकर लगाए गए हैं। यदि यह स्थिति सही है तो भीड़भाड़ के दौरान किसी अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि झूलों की स्थापना के समय सुरक्षा मानकों का निरीक्षण किस अधिकारी ने किया?

लेआउट में किसका आदेश, किसके इशारे पर हुआ काम?

मेले का लेआउट तैयार कराने को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। सुरेंद्र साहू ने सवाल उठाया कि प्रभार सूची में गोकुल प्रजापति का नाम शामिल नहीं होने के बावजूद उनके द्वारा मेले का लेआउट किस अधिकार से डलवाया गया? आखिर किस अधिकारी के आदेश पर यह जिम्मेदारी सौंपी गई? इस पूरे मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है।

20 से 25 फीट के रास्ते घटकर 10 से 12 फीट कैसे हुए?

मेले के अंदर आवागमन के रास्तों की चौड़ाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सुरेंद्र साहू का आरोप है कि निर्धारित मानकों के अनुसार रास्ते 20 से 25 फीट चौड़े होने चाहिए, लेकिन मौके पर कई रास्तों की चौड़ाई घटाकर महज 10 से 12 फीट कर दी गई है। ऐसे में मेले में उमड़ने वाली भीड़ के बीच भगदड़ या आपातकालीन स्थिति पैदा होने पर लोगों को बाहर निकालना बड़ी चुनौती बन सकता है।

अधिकारियों की चुप्पी से बढ़ा विवाद

इन आरोपों को लेकर जब नगर पालिका के अधिकारियों से सवाल किए गए तो स्पष्ट जवाब नहीं मिलने की बात सामने आई है। इससे मेला प्रबंधन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर झूलों की स्थापना की अनुमति किस आधार पर दी गई? सुरक्षा मानकों का पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? ठेका प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई या नहीं?

जनता के मनोरंजन के नाम पर सुरक्षा से समझौता क्यों?

मेला जलविहार में हर दिन बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएं और परिवार पहुंचते हैं। ऐसे में झूलों की सुरक्षा और रास्तों की व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि हजारों लोगों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।

अब नगर पालिका प्रशासन की जिम्मेदारी है कि झूलों की स्थापना, ठेका प्रक्रिया, लेआउट और रास्तों की चौड़ाई की निष्पक्ष जांच कराए। साथ ही सुरक्षा मानकों का भौतिक सत्यापन कराकर जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।

बड़ा सवाल: मेले में नियमों की अनदेखी किसके संरक्षण में हुई और यदि कोई हादसा होता है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

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