छतरपुर में आम आदमी की बाइक पर कानून का डंडा और यात्री बसों पर इतनी नरमी क्यों?एक गरीब आदमी मोटरसाइकिल लेकर सड़क पर निकले तो हेलमेट से लेकर बीमा और कागज तक सब कुछ चेक होता है। छोटी सी कमी मिली नहीं कि चालान तैयार।लेकिन जब बात यात्री बसों की ओवरलोडिंग, फिटनेस, परमिट, सुरक्षा मानकों और कथित रूप से यात्री बसों में माल परिवहन की आती है, तो आखिर आरटीओ विभाग की निगरानी कहां चली जाती है?
❓ क्या बसों की नियमित जांच नहीं होनी चाहिए?
❓ क्या बस की निर्धारित क्षमता जांचना आरटीओ की जिम्मेदारी नहीं है?
❓ क्या फिटनेस और परमिट केवल कागजों में देखकर छोड़ दिए जाते हैं?
❓ क्या बस स्टैंड पर खड़ी बसों का भौतिक निरीक्षण नहीं होना चाहिए?
❓ क्या बार-बार शिकायत मिलने के बाद भी जांच जरूरी नहीं समझी जाती?और सबसे बड़ा सवाल—
जब एक बस दुर्घटना में 9 लोगों की जान जा चुकी है, तब भी अगर कथित ओवरलोडिंग और नियमों के उल्लंघन की शिकायतें सामने आती रहें और कार्रवाई हादसे के बाद ही दिखाई दे, तो फिर जवाबदेही किसकी तय होगी?आरटीओ विभाग का काम केवल दुर्घटना होने के बाद चालान काटना या औपचारिक कार्रवाई करना नहीं है।आरटीओ की असली जिम्मेदारी है—खतरनाक और नियम विरुद्ध वाहन सड़क पर उतरने से पहले उन्हें रोकना।
अगर कोई बस निर्धारित क्षमता से ज्यादा यात्रियों को लेकर चल रही है, अगर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन हो रहा है, अगर परमिट की शर्तों के विपरीत संचालन हो रहा है या यात्री बस का इस्तेमाल नियम विरुद्ध माल परिवहन में किया जा रहा है, तो सवाल सीधे परिवहन विभाग से है—
“आपकी निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही है?”
छतरपुर बस स्टैंड पर यदि ऐसी गतिविधियां खुलेआम हो रही हैं, तो यह केवल बस संचालक का मामला नहीं है।यह उस सरकारी व्यवस्था की भी परीक्षा है, जिसे इन वाहनों की जांच और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।सोशल मीडिया पर शिकायतें।अधिकारियों को सूचना।व्यक्तिगत रूप से जानकारी देने के दावे।फिर भी अगर कार्रवाई दिखाई नहीं देती, तो जनता पूछेगी ही—
“आरटीओ साहब, आप किस दिन जागेंगे?”
क्या अगली बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जा रहा है?
9 मौतें कम थीं क्या?
जनता को हादसे के बाद पंचनामा, बयान और औपचारिक जांच नहीं चाहिए।
जनता चाहती है कि—
जो बस सड़क पर यात्रियों की जान के लिए खतरा है, उसे हादसे से पहले रोका जाए।और यदि शिकायतें गलत हैं तो आरटीओ विभाग खुलकर बताए कि जांच में क्या पाया गया।लेकिन यदि शिकायतें सही हैं, तो जिम्मेदार बस संचालकों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
कानून अगर गरीब की बाइक के लिए जागता है,तो बस मालिकों के लिए भी जागना चाहिए।क्योंकि—सड़क पर गरीब की जान भी उतनी ही कीमती है, जितनी किसी बड़े आदमी की।
छतरपुर पूछ रहा है—
आरटीओ विभाग जवाब देगा या अगली दुर्घटना का इंतजार करेगा?

