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सामने आईं विकास के दावों की पोल खोलने वाली तस्वीरें, सिस्टम पर उठे सवाल

 


मक्तिधाम के अभाव में तिरपाल के नीचे करना पड़ा अंतिम संस्कारचा,चारपाई से मरीज को अस्पताल ले जाने को मजबूर हुए ग्रामीण।

छतरपुर। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भले ही ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों लेकिन जमीनी हकीकत इसकी विपरीत है। ताजा मामले छतरपुर जिले की लवकुशनगर और गौरिहार जनपद पंचायतों के दो अलग-अलग स्थानों से सामने आए हैं, जिनसे प्रशासन की संवेदनहीनता और लापरवाही उजागर हुई है। एक ओर लवकुशनगर के कटहरा गांव के मड़वा में मुक्तिधाम न होने से ग्रामीण बरसात में तिरपाल के नीचे अंतिम संस्कार करने को मजबूर नजर आए, तो वहीं दूसरी ओर गौरिहार के हटवा गांव में पक्की सड़क न होने से मरीजों को चारपाई पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ा।
केस-1: तिरपाल के नीचे हुआ अंतिम संस्कार
नोट: इस समाचार के साथ फोटो क्रमांक 01 लगाएं।
पहला मामला लवकुशनगर जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत कटहरा के मड़वा गांव का है, जहां बीमारी के कारण बीते रोज विपिन शर्मा की पत्नी रोशनी की मृत्यु हो गई थी। जब अंतिम संस्कार के लिए परिजन शव को गांव के शमशान घाट ले गए, तभी बारिश शुरू हो गई। यहां मुक्तिधाम की सुविधा न होने के कारण परिजनों को मजबूरन तिरपाल (प्लास्टिक की पन्नी) लगाकर चिता को जलाना पड़ा। चिता में आग फैलने तक लोग तिरपाल पकड़े खड़े रहे। इसी दौरान किसी ने वीडियो बना लिया, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर रहा है। शोकग्रस्त परिवार के रोहित शर्मा और विनोद शर्मा ने बताया कि गांव में मुक्तिधाम न होने से सभी ग्रामीणों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच और सचिव की उदासीनता के चलते मुक्तिधाम का निर्माण नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जहां करोड़ों रुपये की जेसीबी मशीनों से खेत तालाब खोदे गए, वहीं एक छोटे से मुक्तिधाम के लिए फंड की कमी बताई जा रही है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से तत्काल मुक्तिधाम निर्माण की मांग की है, ताकि बारिश में ऐसी अमानवीय स्थिति से बचा जा सके।
 चारपाई पर लिटाकर मरीज को अस्पताल ले गए परिजन-

दूसरा मामला गौरिहार जनपद पंचायत के हटवा गांव का है, जहां पक्की सड़क न होने से ग्रामीणों का जीवन संघर्षमय बना हुआ है। गौरिहार से करीब 22 किलोमीटर दूर हटवा पंचायत के तुलसिया पुरवा, नाई का पुरवा, बहादुर का पुरवा और पालो का पुरवा में करीब 400 लोग निवास करते हैं, लेकिन इन गांवों तक पक्की सड़क नहीं पहुंची। कच्चे और कीचड़ भरे रास्तों के कारण बीमार व्यक्तियों को खाट पर ढोकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है, जहां से ही एम्बुलेंस या अन्य वाहन उपलब्ध हो पाते हैं। ग्रामीण पप्पू पाल ने बताया कि पंचायत कार्यालय की दूरी 2 किलोमीटर है, लेकिन कीचड़ भरे रास्तों के कारण मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। बरसात में स्थिति और बदतर हो जाती है, जब रास्ते दलदल में बदल जाते हैं। ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन से पक्की सड़क की मांग की, लेकिन केवल आश्वासन ही मिले। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर सिर्फ कागजी वादे किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत में वे मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
सिस्टम पर सवाल, ग्रामीणों में आक्रोश
ये दोनों मामले ग्रामीण विकास के दावों पर गंभीर सवाल उठाते हैं। मड़वा में मुक्तिधाम की कमी और हटवा में पक्की सड़क का अभाव न केवल प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है, बल्कि सरपंच, सचिव और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक विकास के दावे खोखले ही रहेंगे। जिला प्रशासन और जनपद पंचायत से ग्रामीणों ने तत्काल कार्रवाई की मांग की है। मड़वा में मुक्तिधाम निर्माण और हटवा में पक्की सड़क बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि ग्रामीणों को इन अमानवीय परिस्थितियों से निजात मिल सके।

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